पंजाब

क्या फिर साथ आएंगे अकाली दल और BJP? SAD के संकेतों के बीच भाजपा का रुख अब भी साफ

पंजाब की राजनीति में शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के रिश्तों को लेकर एक बार फिर चर्चाएं तेज हो गई हैं। करीब छह साल पहले कृषि कानूनों के मुद्दे पर दोनों दलों का गठबंधन टूट गया था, लेकिन अब पिछले कुछ वर्षों में अकाली दल की ओर से BJP के प्रति नरम रुख के कई संकेत सामने आए हैं। दिलचस्प बात यह है कि अकाली दल की तरफ से लगातार सकारात्मक संकेत मिलने के बावजूद भाजपा ने अभी तक सार्वजनिक तौर पर ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है, जिससे दोनों दलों के दोबारा गठबंधन की पुष्टि हो सके। भाजपा फिलहाल पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी का संदेश दे रही है। पार्टी का जोर संगठन को मजबूत करने और राज्य में अपने दम पर सरकार बनाने की रणनीति पर है। अगस्त में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव संगठन बीएल संतोष के पंजाब दौरे के दौरान भी पार्टी की तैयारियों का यही संकेत मिला था। उन्होंने सभी 117 विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने और चुनावी तैयारी पर जोर दिया था। इसके बाद 31 अगस्त को भाजपा के पंजाब संगठन प्रभारी सतीश पूनिया ने भी पार्टी के इसी रुख को दोहराया। इससे साफ संकेत मिला कि भाजपा फिलहाल किसी पुराने गठबंधन पर निर्भर रहने के बजाय अपने संगठन का विस्तार करने पर फोकस कर रही है। हालांकि, दूसरी तरफ राजनीतिक गलियारों में अकाली दल और भाजपा के बीच पर्दे के पीछे बातचीत की चर्चाएं भी लगातार चल रही हैं। ऐसे में दोनों दलों के बीच गठबंधन की संभावनाओं को पूरी तरह खत्म मानना जल्दबाजी होगी। अकाली दल की ओर से पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मौके आए हैं, जब पार्टी का रुख भाजपा के प्रति सकारात्मक दिखाई दिया। इन्हीं घटनाओं को दोनों दलों के रिश्तों में संभावित बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

अकाली दल की तरफ से पहला बड़ा सकारात्मक संकेत जुलाई 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में देखने को मिला था। सितंबर 2020 में कृषि कानूनों के विरोध के बीच भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन से अलग होने के करीब दो साल बाद अकाली दल ने NDA की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू का समर्थन किया था। उस समय अकाली दल का यह फैसला राजनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण माना गया था। गठबंधन टूटने के बाद दोनों दलों के बीच दूरी बनी हुई थी, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन ने दोनों के बीच संवाद की संभावनाओं को लेकर चर्चाओं को फिर हवा दी। इसके बाद महिला आरक्षण के मुद्दे पर भी अकाली दल की ओर से केंद्र सरकार के रुख के समर्थन के संकेत सामने आए। अगस्त 2026 में पार्टी ने महिला आरक्षण विधेयक को तत्काल लागू करने की मांग करते हुए केंद्र के रुख का समर्थन किया। अकाली दल ने परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव पर भी सहमति जताई। इसमें सभी राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या समान रूप से 50 प्रतिशत बढ़ाने की बात कही गई थी। इस घटनाक्रम को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि यह रुख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात के बाद सामने आया। इसके बाद दोनों दलों के बीच राजनीतिक संवाद को लेकर अटकलें और तेज हो गईं। अकाली दल की ओर से तीसरा महत्वपूर्ण संकेत 31 अगस्त 2026 को पंजाब विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के दौरान मिला। अकाली दल के छात्र संगठन स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया यानी SOI ने भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ABVP के उम्मीदवार को समर्थन दिया। SOI का उम्मीदवार चुनावी मुकाबले से बाहर होने के बाद संगठन ने अंतिम समय में ABVP के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार अंकित बिढान को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान किया। इस समर्थन का असर चुनाव परिणाम में भी देखने को मिला। अंकित बिढान ने 512 मतों के अंतर से जीत दर्ज की। इस घटनाक्रम को अकाली दल और भाजपा से जुड़े छात्र संगठनों के बीच संभावित नजदीकी के संकेत के तौर पर देखा गया।

इन तीनों घटनाओं को जोड़कर देखें तो अकाली दल की तरफ से भाजपा के प्रति राजनीतिक रूप से सकारात्मक संकेत जरूर दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, भाजपा की ओर से अभी तक गठबंधन को लेकर कोई स्पष्ट सार्वजनिक घोषणा नहीं की गई है। भाजपा का मौजूदा फोकस पंजाब में संगठन को मजबूत करने और सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपनी राजनीतिक ताकत आजमाने पर है। पार्टी लंबे समय से राज्य में अपने आधार को बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। यही वजह है कि पंजाब की सियासत में इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अकाली दल और भाजपा एक बार फिर पुराने गठबंधन की ओर लौटेंगे या दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरेंगी। फिलहाल अकाली दल की ओर से रिश्ते सुधारने के संकेत लगातार दिखाई दे रहे हैं, जबकि भाजपा अपने संगठन विस्तार और 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति पर कायम नजर आ रही है। आने वाले समय में दोनों दलों के बीच बातचीत और राजनीतिक गतिविधियां इस तस्वीर को और स्पष्ट कर सकती हैं। अगर पर्दे के पीछे चल रही बातचीत किसी ठोस राजनीतिक समझौते तक पहुंचती है, तो पंजाब के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की सियासत में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल दोनों दलों के रिश्तों को लेकर सस्पेंस बरकरार है और पंजाब की राजनीति में हर नए राजनीतिक कदम पर नजर बनी हुई है।

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