PRTC आउटसोर्स कर्मचारियों को बड़ा झटका, हाईकोर्ट ने नियमितीकरण का आदेश किया रद्द

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पीईपीएसयू रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (पीआरटीसी) में काम कर रहे आउटसोर्स कर्मचारियों को बड़ा झटका दिया है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें इन कर्मचारियों की सेवाओं को पीआरटीसी में नियमित करने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी का लंबे समय तक निगम में काम करना अपने आप में उसे नियमित कर्मचारी का दर्जा देने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी तरह निगम के अधिकारियों के निर्देश पर ड्यूटी करना भी सीधे नियोक्ता-कर्मचारी संबंध का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि नियमितीकरण का दावा तभी किया जा सकता है, जब कर्मचारी और संबंधित सरकारी संस्था के बीच सीधा नियोक्ता-कर्मचारी संबंध साबित हो।
इस मामले में अदालत को ऐसा सीधा संबंध स्थापित होता हुआ नहीं मिला। मामले में शामिल कर्मचारियों में चालक, कंडक्टर और अन्य कर्मचारी शामिल थे। इन सभी की भर्ती सीधे पीआरटीसी ने नहीं की थी, बल्कि निजी एजेंसी एमएस एसएस सर्विस प्रोवाइडर्स के माध्यम से की गई थी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, निजी एजेंसी ने चालकों, कंडक्टरों और अन्य पदों के लिए विज्ञापन जारी कर भर्ती प्रक्रिया पूरी की थी। चयनित कर्मचारियों को बाद में पीआरटीसी में ड्यूटी करने के लिए भेजा गया था। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान नियुक्ति से जुड़े रिकॉर्ड और कर्मचारियों को मिलने वाले लाभों की व्यवस्था को भी देखा। अदालत ने पाया कि पीआरटीसी की ओर से इन कर्मचारियों को कभी सीधे नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया गया था।
अदालत के मुताबिक, कर्मचारियों को पीआरटीसी के अस्थायी या तदर्थ कर्मचारियों के तौर पर भी दर्ज नहीं किया गया था।
इसके अलावा उनका वेतन भी निजी एजेंसी के माध्यम से ही दिया जाता था। कर्मचारियों के भविष्य निधि यानी पीएफ से संबंधित राशि भी निजी एजेंसी की ओर से जमा कराई जाती थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए खंडपीठ ने माना कि कर्मचारियों और पीआरटीसी के बीच सीधे नियोक्ता-कर्मचारी संबंध को साबित नहीं किया जा सका। इस मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 22 अप्रैल 2026 को कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था। एकल पीठ ने उनकी सेवाओं को पीआरटीसी में नियमित करने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही एकल पीठ ने पात्र कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना सहित अन्य संबंधित लाभ देने के मुद्दे पर भी विचार करने के निर्देश दिए थे। इस फैसले के बाद पीआरटीसी ने इसे चुनौती देते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ का रुख किया।
पीआरटीसी की ओर से एकल पीठ के फैसले के खिलाफ कुल चार अपीलें दायर की गई थीं।
खंडपीठ ने इन अपीलों को स्वीकार करते हुए एकल पीठ के आदेश को रद्द कर दिया। खंडपीठ ने अपने फैसले में आउटसोर्सिंग व्यवस्था को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की। अदालत ने कहा कि निर्धारित शर्तों के तहत आउटसोर्स कर्मचारियों को संबंधित संस्था में वार्षिक अनुबंध के आधार पर काम पर लगाया जा सकता है। हालांकि, इस तरह की व्यवस्था में लंबे समय तक काम करने से कर्मचारी को स्वत: सरकारी या निगम का नियमित कर्मचारी होने का अधिकार नहीं मिल जाता। नियमितीकरण के लिए अलग से कानूनी आधार और सीधा रोजगार संबंध साबित करना जरूरी है।
अदालत ने साफ किया कि लंबे समय तक सेवा देना अकेले नियमितीकरण का आधार नहीं बन सकता।
कर्मचारियों का निगम के अधिकारियों के निर्देशन में रोजमर्रा की ड्यूटी करना भी उन्हें निगम का प्रत्यक्ष कर्मचारी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस फैसले का सीधा असर उन आउटसोर्स कर्मचारियों पर पड़ा है, जो लंबे समय से पीआरटीसी की सेवाओं में चालक, कंडक्टर और अन्य भूमिकाओं में काम कर रहे थे। हाईकोर्ट के फैसले के बाद उनके नियमितीकरण और उससे जुड़े लाभों का दावा प्रभावित हुआ है। खंडपीठ ने मामले में नियुक्ति की वास्तविक प्रकृति और भुगतान की व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना। चूंकि भर्ती निजी एजेंसी के माध्यम से हुई थी और वेतन तथा पीएफ का भुगतान भी एजेंसी कर रही थी, इसलिए पीआरटीसी के साथ सीधे कर्मचारी संबंध का दावा स्वीकार नहीं किया गया। इस फैसले से एक बार फिर आउटसोर्स कर्मचारियों के नियमितीकरण को लेकर कानूनी स्थिति सामने आई है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल लंबे समय तक किसी सरकारी संस्था में काम करने के आधार पर नियमित कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया जा सकता।




