पंजाब में BJP-अकाली दल की फिर दोस्ती के संकेत, 60 सीटों पर भाजपा की नजर

पंजाब की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के बीच दोबारा गठबंधन की चर्चाएं तेज होती नजर आ रही हैं। करीब छह साल पहले कृषि कानूनों के मुद्दे पर दोनों दलों के बीच लंबा चला राजनीतिक रिश्ता टूट गया था। अब संभावित गठबंधन की स्थिति में सबसे बड़ा सवाल सीटों के बंटवारे को लेकर है। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा इस बार गठबंधन में करीब 60 विधानसभा सीटों पर दावा करने की तैयारी में है। अगर ऐसा होता है तो यह 1996 से 2020 तक चले दोनों दलों के पुराने सीट बंटवारे से बिल्कुल अलग तस्वीर होगी। उस दौर में अकाली दल 94 विधानसभा सीटों पर और भाजपा 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी। 1996 में मोगा सम्मेलन के बाद अकाली दल और भाजपा के बीच गठबंधन पंजाब की राजनीति में एक मजबूत चुनावी समीकरण बन गया था। दोनों पार्टियों ने अपनी-अपनी सामाजिक और क्षेत्रीय पकड़ के आधार पर चुनावी रणनीति तैयार की थी। अकाली दल की पकड़ मुख्य रूप से ग्रामीण और सिख मतदाताओं के बीच मजबूत मानी जाती थी, जबकि भाजपा का आधार पंजाब के शहरी इलाकों और हिंदू मतदाताओं में था। यही सामाजिक समीकरण दोनों दलों के गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत रहा। लंबे समय तक अकाली दल केंद्र में NDA का प्रमुख सहयोगी रहा। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकारों तक अकाली दल गठबंधन का हिस्सा रहा और उसके नेता केंद्र की सरकारों में मंत्री भी रहे।
हालांकि सितंबर 2020 में कृषि कानूनों को लेकर दोनों दलों के रिश्तों में बड़ा विवाद सामने आया। इसके बाद शिरोमणि अकाली दल ने भाजपा से गठबंधन तोड़ने का फैसला किया और करीब 24 साल पुराना औपचारिक चुनावी रिश्ता समाप्त हो गया। गठबंधन टूटने के बाद भाजपा के सामने पंजाब में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन तैयार करने की चुनौती थी। पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन सीमित रहा। पार्टी सिर्फ दो विधानसभा सीटें जीत सकी और उसका वोट शेयर करीब 6.6 प्रतिशत रहा। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पंजाब में अकेले चुनाव लड़कर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश की। पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, लेकिन उसका वोट शेयर बढ़कर करीब 18.56 प्रतिशत हो गया। इस चुनाव में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह रहा कि पंजाब में पहली बार भाजपा का वोट शेयर शिरोमणि अकाली दल से अधिक रहा। इस प्रदर्शन ने भाजपा के भीतर यह विश्वास बढ़ाया कि पार्टी अब सिर्फ शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। भाजपा ने इसके बाद पंजाब के ग्रामीण इलाकों और सिख मतदाताओं के बीच भी अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया। पार्टी ने कई प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ा, जिससे उसका संगठनात्मक आधार पहले की तुलना में व्यापक हुआ। कैप्टन अमरिंदर सिंह, सुनील जाखड़ और मनप्रीत सिंह बादल जैसे नेताओं का भाजपा में आना इसी बदलाव का हिस्सा माना गया। इन नेताओं के जरिए भाजपा को पंजाब की ग्रामीण राजनीति और पारंपरिक राजनीतिक नेटवर्क में अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका मिला।
2026 के निकाय चुनावों में भी भाजपा ने शहरी क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत होने का दावा किया। अबोहर और पठानकोट जैसे क्षेत्रों में पार्टी की राजनीतिक मौजूदगी चर्चा में रही।भाजपा संगठन में सिख चेहरों को भी ज्यादा महत्व देने की रणनीति दिखाई दे रही है। केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी दिया जाना भी इसी व्यापक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।यही बदली हुई राजनीतिक स्थिति अब भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित सीट बंटवारे की बातचीत को पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण बना रही है। भाजपा पुराने 94-23 फॉर्मूले पर लौटने के बजाय खुद को बराबरी के राजनीतिक साझेदार के तौर पर पेश करना चाहती है।सूत्रों के अनुसार करीब 60 विधानसभा सीटों पर भाजपा का दावा इसी बदली हुई राजनीतिक हैसियत को दर्शाता है। हालांकि अंतिम सीट बंटवारा दोनों दलों के बीच होने वाली बातचीत और जमीनी समीकरणों पर निर्भर करेगा। दूसरी तरफ, अकाली दल के लिए भी भाजपा के साथ दोबारा गठबंधन करना आसान फैसला नहीं होगा। 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा है। ऐसे में अकाली दल के सामने अपनी पारंपरिक ग्रामीण और सिख वोट बैंक पर पकड़ बनाए रखने के साथ-साथ भाजपा के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की चुनौती होगी। अगर दोनों दलों के बीच गठबंधन होता है तो पंजाब की आगामी विधानसभा राजनीति में नया चुनावी समीकरण बन सकता है। हालांकि गठबंधन की सबसे बड़ी परीक्षा सीटों के बंटवारे और दोनों पार्टियों के पारंपरिक वोट बैंक के बीच तालमेल बैठाने की होगी।




