पंजाब

संगरूर में आप के सामने गढ़ बचाने की चुनौती, किसान नाराजगी बढ़ा सकती है मुश्किल


पंजाब की सियासत में संगरूर आम आदमी पार्टी के लिए महज एक लोकसभा क्षेत्र नहीं रहा है। यह क्षेत्र लंबे समय से पार्टी के लिए राजनीतिक ताकत का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। इसी इलाके ने पंजाब में आप को मजबूत जनाधार देने और सत्ता तक पहुंचने में अहम भूमिका निभाई। अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल रही हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी के सामने अपने इस मजबूत गढ़ को कायम रखने की चुनौती खड़ी हो गई है। खासतौर पर किसान मुद्दों और सरकार के खिलाफ बढ़ती नाराजगी को पार्टी के लिए महत्वपूर्ण चुनौती माना जा रहा है। संगरूर संसदीय क्षेत्र मुख्यमंत्री भगवंत मान का गृह क्षेत्र भी है। इसके अलावा वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा दिड़बा से और आप के प्रदेश अध्यक्ष व कैबिनेट मंत्री अमन अरोड़ा सुनाम से विधायक हैं। ऐसे में संगरूर का राजनीतिक महत्व आप के लिए और बढ़ जाता है। 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने संगरूर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सभी नौ विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस प्रदर्शन ने मालवा क्षेत्र में पार्टी की मजबूत पकड़ को साबित किया था।

धूरी से भगवंत मान, सुनाम से अमन अरोड़ा, दिड़बा से हरपाल सिंह चीमा, संगरूर से नरेंद्र कौर भराज, लहरा से बरिंदर कुमार गोयल, बरनाला से गुरमीत सिंह मीत हेयर, भदौड़ से लाभ सिंह उगोके, महल कलां से कुलवंत सिंह पंडोरी और मलेरकोटला से मोहम्मद जमील-उर-रहमान ने जीत हासिल की थी। बाद में मीत हेयर के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद बरनाला विधानसभा सीट खाली हुई और वहां उपचुनाव कराया गया। इसके बाद क्षेत्र के राजनीतिक समीकरणों में बदलाव देखने को मिला। फिलहाल संगरूर संसदीय क्षेत्र की नौ विधानसभा सीटों में आप का प्रभाव मजबूत बना हुआ है, जबकि बरनाला सीट को लेकर राजनीतिक स्थिति अलग रही है। संगरूर में आम आदमी पार्टी का राजनीतिक इतिहास भी काफी मजबूत रहा है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भगवंत मान ने लगातार दो बार जीत दर्ज कर इस क्षेत्र को पार्टी के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्रों में शामिल कर दिया। 2022 के विधानसभा चुनाव में सभी नौ सीटों पर जीत ने आप की इस पकड़ को और मजबूत कर दिया। हालांकि, उसी साल मुख्यमंत्री बनने के कुछ समय बाद हुए संगरूर लोकसभा उपचुनाव में पार्टी को बड़ा झटका लगा। शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के सिमरनजीत सिंह मान ने आप उम्मीदवार को हराकर संगरूर लोकसभा सीट पर कब्जा कर लिया। इस परिणाम ने यह संकेत दिया कि मजबूत राजनीतिक आधार के बावजूद संगरूर के मतदाता किसी भी समय अपना रुख बदल सकते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने एक बार फिर संगरूर सीट पर वापसी की। इस जीत से पार्टी को अपने पुराने गढ़ में राजनीतिक मजबूती का संदेश मिला, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में उसके सामने इस समर्थन को बरकरार रखने की चुनौती बनी हुई है। संगरूर और पूरे मालवा क्षेत्र में किसान राजनीति का प्रभाव काफी गहरा है। भारतीय किसान यूनियन (एकता उगराहां) की भी इस क्षेत्र में मजबूत सक्रियता रही है। किसान आंदोलन के दौर से लेकर पंजाब सरकार के खिलाफ विभिन्न मुद्दों पर किसानों के विरोध ने क्षेत्र की राजनीति को लगातार प्रभावित किया है।

किसानों की नाराजगी आम आदमी पार्टी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी ने सत्ता में आने से पहले किसानों और ग्रामीण पंजाब के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया था। अब सरकार के कार्यकाल और उसके फैसलों को लेकर किसान संगठनों की प्रतिक्रिया राजनीतिक तौर पर असर डाल सकती है। मालवा के मतदाताओं को पंजाब की राजनीति में अपने स्पष्ट राजनीतिक फैसलों के लिए जाना जाता है। यहां मतदाता किसी नेता या पार्टी को मजबूत समर्थन देते हैं, लेकिन परिस्थितियां बदलने पर सत्ता के खिलाफ भी जनादेश देने में पीछे नहीं रहते। ऐसे में मुख्यमंत्री भगवंत मान, मंत्रियों, सांसद और आप के विधायकों के सामने अपने-अपने क्षेत्रों में जनता का भरोसा बनाए रखने की चुनौती होगी। खासकर किसान, रोजगार, महंगाई और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे आने वाले समय में चुनावी चर्चा का केंद्र बन सकते हैं। संगरूर में आप की मजबूत संगठनात्मक मौजूदगी और पुराने चुनावी प्रदर्शन पार्टी के लिए बड़ी ताकत हैं। लेकिन किसान संगठनों की सक्रियता और बदलते राजनीतिक माहौल को नजरअंदाज करना पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है। फिलहाल संगरूर आम आदमी पार्टी के लिए सिर्फ एक चुनावी क्षेत्र नहीं बल्कि उसकी राजनीतिक पहचान से जुड़ा इलाका है। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी अपने पुराने जनाधार को कितना मजबूत रख पाती है और किसान आक्रोश समेत बदलते राजनीतिक समीकरणों का सामना किस रणनीति के साथ करती है।

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