पंजाब

रायकोट में 2027 से पहले सियासी हलचल तेज, वारिस पंजाब दे ने शुरू की गांवों में बैठकों की कवायद


पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं। मालवा की महत्वपूर्ण रायकोट विधानसभा सीट पर भी राजनीतिक गतिविधियां बढ़ गई हैं। अलग-अलग दलों ने अभी से अपने संगठन को मजबूत करने और मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। रायकोट सीट पर अकाली दल वारिस पंजाब दे ने अभी तक अपने उम्मीदवार के नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। इसके बावजूद पार्टी के हलका इंचार्ज जगरूप सिंह हसनपुर क्षेत्र में लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं। हसनपुर की ओर से गांवों और कस्बों में बैठकें आयोजित की जा रही हैं। इन बैठकों में पार्टी की गतिविधियों, पंथक मुद्दों और संगठन को मजबूत करने को लेकर चर्चा की जा रही है। पार्टी की कोशिश खास तौर पर युवाओं और पुराने अकाली परिवारों को अपने साथ जोड़ने की बताई जा रही है। बैठकों के जरिए स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं से संपर्क बढ़ाया जा रहा है और पार्टी के संदेश को लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। रायकोट को लंबे समय से टकसाली अकाली राजनीति के प्रभाव वाले क्षेत्र के तौर पर देखा जाता रहा है। दिवंगत जत्थेदार जगदेव सिंह तलवंडी का इस क्षेत्र की राजनीति में लंबे समय तक महत्वपूर्ण प्रभाव रहा था। जगदेव सिंह तलवंडी और उनके बड़े बेटे रंजीत सिंह तलवंडी के निधन के बाद रायकोट में पारंपरिक अकाली राजनीति कमजोर होती गई। इसके बाद पुराने अकाली समर्थकों और परिवारों के बीच राजनीतिक विभाजन भी देखने को मिला। अब रायकोट में टकसाली अकाली वोट बैंक को लेकर अलग-अलग राजनीतिक धड़ों की सक्रियता बढ़ रही है। वारिस पंजाब दे भी इसी वोट बैंक में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती नजर आ रही है। जगरूप सिंह हसनपुर का दावा है कि क्षेत्र में युवा वर्ग और अकाली पृष्ठभूमि वाले कई परिवार वारिस पंजाब दे के साथ जुड़ रहे हैं। पार्टी की बैठकों में भी युवाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। रायकोट की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर पर नजर डालें तो पिछले दो विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने इस सीट पर जीत दर्ज की है। ऐसे में AAP के प्रभाव को चुनौती देना भी अन्य दलों के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक लक्ष्य रहेगा। कांग्रेस की ओर से कामिल अमर सिंह बोपाराय भी क्षेत्र में सक्रिय बताए जा रहे हैं। ऐसे में 2027 के चुनाव में रायकोट सीट पर मुकाबला कई दलों के बीच होने की संभावना है।

रायकोट में अकाली वोट बैंक का बिखराव भी चुनावी समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। पुराने अकाली परिवार अलग-अलग धड़ों की ओर रुख कर रहे हैं। कुछ समर्थकों का झुकाव अकाली दल के दूसरे धड़ों की ओर है, जबकि कुछ वारिस पंजाब दे के साथ जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इसी बदलते राजनीतिक समीकरण के बीच जगरूप सिंह हसनपुर की गांवों और कस्बों में लगातार बैठकें महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। पार्टी पंथक विचारधारा और पुराने अकाली आधार के जरिए अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। अगर वारिस पंजाब दे रायकोट में पुराने अकाली समर्थकों और युवा मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में सफल रहती है, तो इसका सीधा असर 2027 के विधानसभा चुनाव के समीकरण पर पड़ सकता है। खास तौर पर अकाली दल बादल के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगने की स्थिति में मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है। हालांकि फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि वारिस पंजाब दे की सक्रियता चुनाव में कितनी बड़ी भूमिका निभाएगी। पार्टी की ओर से अभी तक रायकोट के लिए उम्मीदवार की घोषणा नहीं की गई है। ऐसे में आने वाले समय में प्रत्याशी का नाम भी पार्टी की चुनावी रणनीति के लिए महत्वपूर्ण होगा। वहीं, क्षेत्र में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों के बीच प्रशासन और सरकारी तंत्र की नजर भी विभिन्न राजनीतिक गतिविधियों पर बनी हुई है। आने वाले महीनों में जैसे-जैसे 2027 का चुनाव नजदीक आएगा, रायकोट में सियासी सक्रियता और बढ़ने की संभावना है। फिलहाल जगरूप सिंह हसनपुर की बैठकों ने रायकोट की अकाली राजनीति में नई चर्चा जरूर छेड़ दी है। अब देखना होगा कि गांव-गांव शुरू हुआ यह संपर्क अभियान वारिस पंजाब दे को कितना राजनीतिक लाभ पहुंचाता है और क्या पार्टी पुराने अकाली वोट बैंक में अपनी मजबूत जगह बना पाती है।

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