पंजाब

शहरी हिंदू से ग्रामीण सिख तक, पंजाब में BJP का नया राजनीतिक फॉर्मूला

भारतीय जनता पार्टी ने पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर पंजाब की राजनीति में अपनी रणनीति को और स्पष्ट कर दिया है। यह फैसला खास तौर पर मालवा क्षेत्र और ग्रामीण सिख राजनीति में भाजपा की पकड़ मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। मनप्रीत बादल के पास पंजाब की राजनीति का लंबा अनुभव है। वह शिरोमणि अकाली दल, पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब और कांग्रेस में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा चुके हैं। बादल परिवार से उनके रिश्ते और मालवा की राजनीति की गहरी समझ भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी हो सकती है। मनप्रीत बादल की सबसे बड़ी ताकत उनका प्रशासनिक अनुभव माना जाता है। वह पंजाब में कई बार वित्त मंत्री रह चुके हैं और नौ बार बजट पेश करने का रिकॉर्ड उनके नाम है। भाजपा को उम्मीद है कि उनका अनुभव पार्टी को पंजाब के राजनीतिक और ग्रामीण समीकरणों को समझने में मदद करेगा। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, उनकी नई जिम्मेदारी केवल संगठनात्मक पद नहीं है। भाजपा इसका इस्तेमाल अकाली दल के पुराने नेताओं और असंतुष्ट राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक पहुंच बनाने के लिए भी कर सकती है। खासकर मालवा में मनप्रीत बादल के पुराने संपर्क पार्टी के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भाजपा को तुरंत बड़ा चुनावी फायदा मिल जाएगा। 2022 के विधानसभा चुनाव में मनप्रीत बादल को हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद 2024 के गिद्दड़बाहा उपचुनाव में भी वह जीत हासिल नहीं कर सके। इसलिए उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता को वोट में बदलना अभी भाजपा के सामने बड़ी चुनौती है।

अकाली दल के लिए भी यह नियुक्ति चिंता का कारण बन सकती है। अगर मनप्रीत बादल अपने पुराने अकाली संपर्कों को फिर से सक्रिय करते हैं तो भाजपा को उन नेताओं और कार्यकर्ताओं तक पहुंच मिल सकती है जो शिअद की मौजूदा राजनीति से असंतुष्ट हैं।   हालांकि, इसे अभी से बड़े स्तर की दल-बदल की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी। अकाली दल का अपना मजबूत संगठन और ग्रामीण नेटवर्क है। भाजपा को इस नेटवर्क को चुनौती देने के लिए लंबे समय तक स्थानीय स्तर पर संगठन मजबूत करना होगा। मनप्रीत बादल भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित भविष्य के संवाद में भी भूमिका निभा सकते हैं। अगर आने वाले समय में दोनों दल दोबारा गठबंधन की दिशा में बढ़ते हैं तो उनके पुराने राजनीतिक रिश्ते बातचीत को आसान बनाने में मदद कर सकते हैं। लेकिन इस संभावित गठबंधन के सामने कई चुनौतियां भी हैं। भाजपा अब पंजाब में पहले की तुलना में ज्यादा स्वतंत्र राजनीतिक विस्तार चाहती है। ऐसे में सीटों के बंटवारे और नेतृत्व को लेकर पुराने समीकरण दोबारा बनाना आसान नहीं होगा।

भाजपा की पंजाब रणनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव सबसे बड़ा लक्ष्य दिखाई दे रहा है। पार्टी लंबे समय तक पंजाब में मुख्य रूप से शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच मजबूत रही है। अकाली दल से अलग होने के बाद उसके सामने ग्रामीण सिख मतदाताओं के बीच आधार बनाने की चुनौती बढ़ गई है। इसी रणनीति के तहत भाजपा ने पंजाब के कई प्रभावशाली सिख नेताओं को अपने साथ जोड़ा है। कैप्टन अमरिंदर सिंह के बाद मनप्रीत बादल जैसे नेताओं की मौजूदगी पार्टी को यह संदेश देने में मदद करती है कि भाजपा पंजाब में केवल शहरी हिंदू राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। मालवा इस पूरी रणनीति का सबसे अहम हिस्सा है। पंजाब की राजनीति में मालवा क्षेत्र का खास महत्व है और यहां मजबूत प्रदर्शन के बिना विधानसभा चुनाव में बड़ी सफलता हासिल करना मुश्किल है। मनप्रीत बादल का राजनीतिक आधार इसी क्षेत्र से जुड़ा रहा है। भाजपा अब ऐसा राजनीतिक ढांचा तैयार करने की कोशिश कर रही है जिसमें एक तरफ उसका पारंपरिक शहरी हिंदू आधार मजबूत रहे और दूसरी तरफ ग्रामीण सिख नेतृत्व को भी जगह मिले। मनप्रीत बादल को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और तरुण चुघ को राष्ट्रीय महामंत्री की जिम्मेदारी देना इसी संतुलन की ओर संकेत करता है।

2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़कर 18.56 फीसदी हो गया था। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को 6.60 फीसदी वोट मिले थे। यानी लोकसभा चुनाव में पार्टी के वोट शेयर में करीब 12 प्रतिशत अंकों की बढ़ोतरी हुई। लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि 18.56 फीसदी वोट के बावजूद भाजपा पंजाब में एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी। इससे साफ है कि पार्टी के सामने केवल वोट प्रतिशत बढ़ाने की नहीं, बल्कि वोट को सीटों में बदलने की चुनौती है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 73 सीटों पर चुनाव लड़ा था और सिर्फ दो सीटें जीत पाई थी। इसलिए 2027 में पार्टी को अपने लोकसभा वोट शेयर को विधानसभा सीटों में बदलने के लिए मजबूत बूथ संगठन, स्थानीय चेहरे और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ाने की जरूरत होगी। मनप्रीत बादल की राष्ट्रीय नियुक्ति इसी बड़े प्रयोग का हिस्सा मानी जा सकती है। अब देखना होगा कि वह अपने राजनीतिक अनुभव और पुराने संपर्कों का इस्तेमाल भाजपा के संगठन विस्तार में कितनी प्रभावी तरीके से कर पाते हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की असली परीक्षा मालवा और ग्रामीण पंजाब में होगी। अगर पार्टी अपने शहरी आधार को बनाए रखते हुए सिख और ग्रामीण मतदाताओं में भरोसा बढ़ाने में सफल रहती है, तो पंजाब की राजनीति में उसका मुकाबला पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो सकता है।

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