कैथल बच्ची दुष्कर्म-हत्या केस में बड़ा फैसला, फांसी की सजा उम्रकैद में बदली


कैथल में सात साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या के मामले में पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने दोषी पवन उर्फ मोनी की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह सामान्य उम्रकैद नहीं होगी और दोषी को कम से कम 50 साल की वास्तविक जेल की सजा भुगतनी होगी। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि दोषी को 14 या 20 साल की सजा पूरी होने के बाद सामान्य प्रक्रिया के तहत रिहाई का लाभ नहीं मिलेगा। 50 साल की वास्तविक कैद पूरी करने के बाद ही उसकी रिहाई पर विचार किया जा सकेगा। इस तरह अदालत ने दोषी को लंबे समय तक जेल में रखने का निर्देश दिया है। मामला कैथल जिले के एक गांव का है। जानकारी के अनुसार, 8 अक्टूबर 2022 को सात साल की बच्ची घर के बाहर खेलते समय अचानक लापता हो गई थी। परिवार ने बच्ची की तलाश शुरू की, लेकिन उसका कोई पता नहीं चल सका। अगले दिन बच्ची का आधा जला हुआ शव बरामद होने के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गई थी। घटना की सूचना मिलने पर पुलिस ने जांच शुरू की और मामले में पवन उर्फ मोनी को आरोपी बनाया गया। पुलिस जांच और मामले से जुड़े साक्ष्यों के आधार पर आरोपी के खिलाफ कार्रवाई आगे बढ़ी। बाद में निचली अदालत ने पवन उर्फ मोनी को बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दोषी ने पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में अपील दाखिल की थी। हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने अपराध की गंभीरता और मामले से जुड़े तमाम पहलुओं पर विचार किया। सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया, लेकिन साथ ही सामान्य उम्रकैद से अलग कड़ी शर्त भी लगाई। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोषी को कम से कम 50 वर्ष की वास्तविक कैद पूरी करनी होगी और उससे पहले उसकी रिहाई पर विचार नहीं किया जाएगा। अदालत ने दोषी पर कुल 73 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। इसमें हत्या के अपराध के लिए 50 लाख रुपये और बाल यौन अपराध संरक्षण कानून यानी POCSO Act के तहत 23 लाख रुपये का जुर्माना शामिल है। हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जुर्माने से प्राप्त राशि पीड़ित बच्ची के परिवार को मुआवजे के तौर पर दी जाए। यह राशि बच्ची के माता-पिता और भाई-बहनों को बराबर हिस्से में देने का आदेश दिया गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि दोषी जुर्माने की रकम जमा नहीं करता है, तो केवल जुर्माना न भर पाने के आधार पर उसकी निर्धारित कैद की अवधि कम नहीं होगी। उसे अदालत द्वारा तय 50 वर्ष की वास्तविक कैद पूरी करनी होगी और जुर्माने की वसूली की प्रक्रिया कानून के अनुसार जारी रहेगी। हाई कोर्ट का यह फैसला ऐसे मामलों में पीड़ित परिवार को न्याय और मुआवजे के साथ-साथ दोषी को लंबे समय तक समाज से दूर रखने के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए सजा में बदलाव के बावजूद वास्तविक कैद की लंबी अवधि तय की है। इस मामले में बच्ची की हत्या के बाद शव आधा जला हुआ मिलने से घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था। अब हाई कोर्ट के फैसले के बाद दोषी की सजा की अवधि और पीड़ित परिवार को मिलने वाले मुआवजे को लेकर स्थिति स्पष्ट हो गई है।




