उत्तराखंड

जिला पंचायत सदस्यों ने सरकार के खिलाफ खोला मोर्चा, 12 अक्टूबर को सभी 13 जिलों में धरना-प्रदर्शन का ऐलान

देहरादून: उत्तराखंड में पंचायती राज व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर जिला पंचायत सदस्य संगठन ने सरकार के खिलाफ आंदोलन का ऐलान किया है। संगठन ने जिला पंचायत सदस्यों के अधिकारों, विकास कार्यों के लिए वित्तीय व्यवस्था और पंचायती राज संस्थाओं से जुड़ी कथित विसंगतियों को दूर करने की मांग उठाई है। प्रदेश अध्यक्ष भास्कर सम्मल एडवोकेट की अध्यक्षता में हुई बैठक में संगठन के पदाधिकारियों और सदस्यों ने विभिन्न समस्याओं पर चर्चा करते हुए आंदोलन की रणनीति तैयार की। बैठक में निर्णय लिया गया कि यदि सरकार की ओर से मांगों पर जल्द सकारात्मक कार्रवाई नहीं होती है तो प्रदेशभर में चरणबद्ध तरीके से आंदोलन किया जाएगा।

12 अक्टूबर को 13 जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन

संगठन ने अपनी मांगों को लेकर 12 अक्टूबर को उत्तराखंड के सभी 13 जिला मुख्यालयों में एक दिवसीय धरना-प्रदर्शन करने का फैसला लिया है। यह प्रदर्शन मुख्य विकास अधिकारी कार्यालयों के बाहर किया जाएगा। प्रदर्शन के दौरान जिला पंचायत सदस्य संबंधित जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन भेजेंगे। संगठन का कहना है कि इस प्रदर्शन के जरिए सरकार का ध्यान जिला पंचायत सदस्यों की समस्याओं और पंचायती राज व्यवस्था में मौजूद असमानताओं की ओर आकर्षित किया जाएगा।

जिला योजना समिति के गठन की मांग

जिला पंचायत सदस्य संगठन ने प्रदेश में जिला योजना समिति (DPC) का तत्काल गठन किए जाने की मांग उठाई है। संगठन के मुताबिक जिला स्तर पर विकास योजनाओं की बेहतर प्लानिंग और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप विकास कार्यों के लिए जिला योजना समिति की भूमिका महत्वपूर्ण है। संगठन का कहना है कि पंचायती राज संस्थाओं को प्रभावी बनाने के लिए जिला पंचायत प्रतिनिधियों को भी पर्याप्त अधिकार और निर्णय प्रक्रिया में उचित भागीदारी मिलनी चाहिए।

वित्तीय अधिकारों में समानता की मांग

बैठक में जिला पंचायत सदस्यों ने क्षेत्र पंचायत सदस्यों की तर्ज पर जिला पंचायत सदस्यों को भी विकास कार्यों के लिए समान वित्तीय अधिकार और पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराने की मांग रखी। संगठन का आरोप है कि विकास कार्यों के लिए उपलब्ध वित्तीय अधिकारों में असमानता के कारण जिला पंचायत सदस्य अपने क्षेत्रों की जरूरत के अनुसार प्रभावी तरीके से काम नहीं कर पा रहे हैं।

2.50 लाख रुपये की बाध्यता हटाने की मांग

जिला पंचायत सदस्यों ने विकास कार्यों में लागू 2.50 लाख रुपये की वित्तीय सीमा और उससे जुड़ी टेंडर प्रक्रिया को समाप्त करने की मांग भी की है। संगठन के मुताबिक मौजूदा व्यवस्था के कारण छोटे स्तर के विकास कार्यों को भी पूरा कराने में अनावश्यक प्रक्रियात्मक दिक्कतें आती हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरी काम समय पर कराने में परेशानी होने का दावा किया गया है।

15वें वित्त आयोग के कार्यों की जांच की मांग

संगठन ने 15वें वित्त आयोग के तहत जिलों को उपलब्ध कराई गई धनराशि के वितरण और उससे कराए गए विकास कार्यों की उच्च स्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी उठाई है। इसके साथ ही जिला पंचायतों की ओर से बनाई गई सड़कों और अन्य निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की जांच कराने की मांग की गई है। संगठन का कहना है कि विकास कार्यों में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र जांच जरूरी है।

एक सप्ताह में कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन तेज करने की चेतावनी

जिला पंचायत सदस्य संगठन के पदाधिकारियों ने कहा कि सरकार को उनकी मांगों पर तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि एक सप्ताह के भीतर समस्याओं के समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। संगठन का कहना है कि जिला पंचायत सदस्य ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। ऐसे में उनके अधिकारों और वित्तीय संसाधनों को मजबूत किए बिना पंचायती राज व्यवस्था को प्रभावी बनाना मुश्किल होगा।अब सभी की नजरें 12 अक्टूबर को होने वाले प्रदेशव्यापी धरना-प्रदर्शन और सरकार की ओर से आने वाली प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।

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